एक बेसमझ को फ़र्ज़ अता गया कोई ,
दश्त-ए-खता से बे-ख़ता गया कोई
भरशक की कोशिशें पर, नाक़ाम ही रहा,
थी क्या मेरी खता, जता गया कोई
एक बेसमझ को फ़र्ज़ अता गया कोई ,
एक उम्र से ग़ुम था की, खुद की थी ना ख़बर ,
मुझको मेरा पता, बता गया कोई
एक बेसमझ को फ़र्ज़ अता गया कोई ,
मैं कुछ उस्से कह सकूं, पर कहूं कैसे,
करीब मुझसे भी मेरे, आ गया कोई
एक बेसमझ को फ़र्ज़ अता गया कोई ,
जिसके लिए अभी तलक, मैं रह-गुज़र में हूँ
मंज़िल मेरी वही, सजा गया कोई
एक बेसमझ को फ़र्ज़ अता गया कोई ,
दश्त-ए-खता से बे-ख़ता गया कोई