Friday, 2 August 2024

है कोई

 एक  बेसमझ  को  फ़र्ज़  अता  गया  कोई ,

दश्त-ए-खता  से  बे-ख़ता  गया  कोई 


भरशक  की  कोशिशें  पर,  नाक़ाम ही  रहा,

थी  क्या  मेरी  खता,  जता  गया  कोई 

एक  बेसमझ  को  फ़र्ज़  अता  गया  कोई ,


एक  उम्र  से  ग़ुम  था  की,  खुद  की  थी  ना  ख़बर ,

मुझको  मेरा  पता,  बता  गया  कोई  

एक  बेसमझ  को  फ़र्ज़  अता  गया  कोई ,


मैं  कुछ  उस्से  कह सकूं,  पर  कहूं कैसे,

करीब  मुझसे  भी  मेरे,  आ  गया  कोई 

एक  बेसमझ  को  फ़र्ज़  अता  गया  कोई ,


जिसके लिए अभी तलक, मैं रह-गुज़र में हूँ 

मंज़िल मेरी वही, सजा गया कोई 

एक  बेसमझ  को  फ़र्ज़  अता  गया  कोई ,

दश्त-ए-खता  से  बे-ख़ता  गया  कोई