Tuesday, 3 October 2017

कुछ निर्णय कर




कर्म योग के, घोर समर में, आज असत के लिए प्रलय कर
सत की जय कर, कुछ निर्णय कर|

दशों दिशा, हर काल कलित है, अरुण रूप ये भाल मलित है
ह्रदय देश में भरी करुणता, रुग्ण हो रही कहीं तरुणता
जाल असत का बुनने वालों,के हिय में तू सत का भय कर
सत की जय कर, कुछ निर्णय कर |

होना है जो वो तो तय है, किसका, कैसा तुझको भय है
अब इस क्षण मत ग्रीव झुका तू ,भुज फड़की गांडीव उठा तू 
साहस करके, कठिन समय में, पार्थ स्वयं को तू निर्भय कर
सत की जय कर, कुछ निर्णय कर |

वर्तमान का मस्तक नत है, स्वर्ण भविष्य प्रतीक्षारत है|
हाथ तेरे तेरा कृतित्व है, चिंतित अब तेरा पितृत्व है|
विश्वामित के वंशज अब उठ, नवनिर्माण प्रकृति का तय कर| 
सत की जय कर, कुछ निर्णय कर |

कर्म योग के, घोर समर में, आज असत के लिए प्रलय कर
सत की जय कर, कुछ निर्णय कर|

-: रिशु कुमार दुबे "किशोर" :-

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