Monday, 12 January 2015

प्रभात - (कविता )

                                         प्रभात

अंधियारी अब रात जा चुकी करेंगे हम सूरज से बात,
सूरज है पूरब और लाल कितना सुन्दर है ये प्रभात|

              नदियाँ करती हैं कल कल ध्वनि, जिसमे दीखता हैं कल का पल|
              शीतल जल में सूरज-अम्बर, लगते हैं नीले लाल कमल|
              खुश्बू देती ये मंद समीर फूलों से भवरो से लेकर,
              जो कहती हम रहते हैं जहाँ, वो धरती स्वर्ग से हैं सुन्दर|
              नई सुबह हैं , दिन भी नया करनी हमको हैं नयी सुरुआत|
              कितना सुन्दर हैं ये प्रभात.........................

दिखती तो नहीं ये मंद हवा पर कानों में कुछ कहती हैं,
बढ़ते ही रहो तुम भी वैसे जैसे गंगा यु बहती हैं|
सूरज की ये लाल किरण करती सबको हैं स्वर्ण लाल,
धरती का आँचल हम पे हैं हम सब हैं इस माता के लाल |
नए युग की ये नयी सदी, देना है हमें तूफां को मात|
कितना सुन्दर हैं ये प्रभात.........................

                                                             -:रिशु कुमार दुबे  "किशोर":-

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